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यहूदी समुदाय को समर्पित एक लेखक
25 अक्तूबर 2009, 10:20 hrs IST
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Raviwariya
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हिब्रू भाषा को बाइबिल की पुरानी भाषा होने के कारण  पवित्र भाषा के रूप में जाना जाता है।  इतनी पुरानी भाषा के आधुनिक साहित्य को अब तक सिर्फ एक बार नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। यह सौभाग्य मिला 1966 में इजराइल के सेमुएल योसफ एग्नान को। 17 जुलाई, 1888 को यूRेन के गैलीशिया नगर में जन्मे एग्नान उन चुनिंदा यहूदियों में हैं, जिन्हें विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह भी संयोग ही है कि 1966 में उनके साथ एक और यहूदी लेखिका नेली शक्स को भी संयुक्त रूप से साहित्य का नोबल प्रदान किया गया। यहूदी समुदाय के विस्थापन के त्रासद इतिहास को इस प्रकार वैश्विक संवेदना का स्पर्श मिला। एग्नान का गद्य हमें यहूदियों के ऎतिहासिक संघर्ष और आधुनिक विश्व के साथ उसके त्रासद यथार्थ के चित्र दिखाता हुआ एक अलग दुनिया प्रस्तुत करता है।

एग्नान ने पांच साल की उम्र से लिखना शुरू किया और जल्द ही उनकी प्रसिद्धि इस कदर फैल गई कि गायक उनके गीत गाने लगे। बीस बरस की उम्र में कविताएं और कहानियां प्रकाशित होने लगीं। खुद जीवन की राह बनाने के लिए एग्नान घर छोडकर पहले फिलीस्तीन गए, फिर एक प्रकाशक के कहने पर जर्मनी में रहने लगे। लेकिन भाग्य की विडम्बना देखिए कि प्रथम विश्वयुद्ध ने एग्नान का सब कुछ समाप्त कर दिया। उनका घर आग की भेंट चढ गया और सब कुछ स्वाहा हो गया। पांच साल बाद फिर यहूदी विरोधी नाजी माहौल में उनका घर जला दिया गया। दो बार की आगजनी में उनकी पांच हजार किताबें और दो अधूरे उपन्यास, जिनमें एक के सात सौ पेज वे लिख चुके थे, और बहुत सी महžवपूर्ण सामग्री खाक हो गई।

इतने झंझावातों के बीच 1931 में जब उनका उपन्यास 'द ब्राइडल कैनोपी' प्रकाशित हुआ तो हर तरफ से उनकी सराहना की गई। कहा गया कि आधुनिक हिब्ाू्र को एक नया विश्वस्तरीय रचनाकार मिल गया है। इस उपन्यास में एग्नान ने एक ऎसे सरल, भोले और वृद्ध आस्थावान व्यक्ति का चरित्र लिखा जो उन्नीवीं सदी के प्रारंभ में एक उजाड नगर में अपनी बेटी के लिए दूल्हा खोजने के लिए निकला। यह वही उजाड नगर था जिसमें एग्नान ने बचपन और किशोरावस्था के दिन बिताए थे। इस उपन्यास की सरवांतीस के महान उपन्यास 'डॉन क्विक्जोट' से तुलना की गई। अपनी स्मृतियों के शहर गैलीशिया और यरूशलम को एग्नान यहूदी मिथकों और इतिहास के माध्यम से  अपनी तमाम रचनाओं में विविध प्रकार से खोजते रहे। 'ए गेस्ट फॉर द नाइट' में एग्नान ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद नष्ट हुए अपने शहर का मार्मिक चित्रण किया और इस उपन्यास के माध्यम से यूरोप में यहूदी समुदाय का भविष्य देखने का प्रयत्न किया। लेकिन उनका सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास 'द डे बिफोर यस्टरडे' है, जिसमें बीसवीं सदी के प्रारंभिक वषोंü में यहूदियों के सर्वनाश के बाद वैश्विक शरणार्थी बन जाने की महागाथा है। इस उपन्यास में एग्नान ने प्राचीन और तत्कालीन यहूदी जीवन को इस खूबसूरती के साथ पिरोया कि एक महानायक और एक कुत्ते की कथा ने समूचे यहूदी समुदाय की विडंबनाओं को पूरी शिद्दत से उजागर कर दिया। 17 फरवरी, 1970 को एग्नान का निधन हुआ। इस अवधि में उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हुईं, जिनमें से कई का अंगे्रजी और जर्मन में अनुवाद हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी ने उनके अप्रकाशित साहित्य के सुव्यवस्थित प्रकाशन का काम किया। आज इजराइली साहित्य के युवा अध्येता निरंतर एग्नान के साहित्य पर शोध कर रहे हैं।

आलोचक लिपमैन बोडोफ के अनुसार एग्नान अतीत और भविष्य, धर्म और प्रकृति, अध्यात्म और विज्ञान, एकेश्वरवाद और बहुदेववाद, यहूदी परंपरा और यूनानी व रोमन संस्कृति, ईश्वर और प्रकृति। इन सबके बीच घूमते हुए बहुत सूक्ष्म विश्लेषण तो करते हैं, लेकिन शायद नहीं जानते कि ऎसी रस्साकशी में विजेता साफ तौर पर किसी एक को नहीं कहा जा सकता।

इसके साथ-साथ एग्नान की भाषा और कथावस्तु इतनी गंभीर और इस कदर संश्लिष्ट है कि मूल हिब्ा्रू से उनका अनुवाद भी अत्यंत कठिन है। वजह यह भी है कि एग्नान ने अपनी रचनाओं में धर्मग्रंथों के विशद उद्धरण दिए हैं, जिन्हें सामान्य हिब्ाू्र का ज्ञान रखने वाला भी नहीं समझ सकता। इसीलिए आलोचक उन्हें बहुत दुर्भेद्य और अनुवाद के लिहाज से अनुपयुक्त लेखक मानते हैं।

 प्रेमचंद गांधी
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