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सोमवार, 15 मार्च, 2010
न होता मैं तो क्या होता
27 दिसम्बर 2009, 10:28 hrs IST
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Mirza Ghalib
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अब तक हुए शोध बताते हैं कि मिर्जा गालिब ने 1807-08 में शेर कहना शुरू  किया। अब तक की प्राप्त शाइरी के अनुसार सबसे पहले पतंग पर मस्नवी (एक तरह की लंबी कविता जिसमें कोई कहानी या वृत्तांत हो) कही। स्व. अल्लामा कालीदास गुप्ता 'रिजा' द्वारा संपादित 'दीवाने-गालिब' में इसे 1812 की रचना बताया गया है। चंद शेर देखें-

ये जो महफिल में बढाते हैं तुझे
भूल मत इस पर उडाते हैं तुझे
एक दिन तुझको लडा देंगे कहीं
मुफ्त में नाहक कटा देंगे कहीं
1812-13 में दिल्ली उनका स्थाई निवास हो गया। यहां के साहित्यिक वातावरण और अपने-अपने फन के माहिर लोगों की सहज सोहबतों से उनको बडा फायदा हुआ।

अपने आरंभिक काल में गालिब मिर्जा अब्दुल कादिर 'बेदिल' की फारसी शाइरी और उनकी शैली से बहुत प्रभावित रहे और इसे स्वीकार भी किया।
तर्जे-बेदिल में रेख्ता कहना
असदुल्लाह खां कयामत है

        (रचना काल 1812 ई.)
बेदिल के बाद किसी शाइर की मिर्जा गालिब ने तारीफ की है, तो वह मीर तकी मीर है। बेदिल फारसी के महžवपूर्ण शाइर थे तो मीर की महानता उर्दू ही में उजागर हुई है। हालांकि मीर ने फारसी में भी शाइरी की है। यह मीर ही तो थे जिन्होंने अपने अंतिम दिनों में गालिब के प्रारंभिक शेरों को सुनकर भविष्यवाणी की थी कि 'अगर कामिल (परिपूर्ण) उस्ताद मिल गया और उसने इसको सीधे रास्ते पर डाल दिया तो लाजवाब शाइर बन जाएगा, वरना मोहमल (निरर्थक) बकने लगेगा।' मीर को गालिब ने सबसे अलग करके देखा है।
गालिब उन अर्थो में दार्शनिक नहीं हैं जिन अर्थो में सामान्यतया समझा जाता है। वे बुनियादी तौर पर ऎसे शाइर हैं जिन्हें सूफी चिंतन में भी दिलचस्पी है। मिसाल में यह शेर भी देखें-

है गैबे-गैब, जिसको समझते हैं हम शहूद
हैं ख्वाब में हनोज जो जागे हैं ख्वाब में
शहूद (दर्शन) सूफियों के निकट ऎसी अवस्था है जिसमें सूफी साधक को हर वस्तु में ईश्वर का आभास होता है। 'गैबे-गैब... रहस्य का रहस्य या परोक्ष का परोक्ष...अर्थात् जो हमें दिखाई दे रहा है या हम जिसे दिखाई देना समझे हुए हैं वह तो रहस्य का भी रहस्य है। गालिब मुश्किल नहीं मुख्तलिफ (भिन्न) हैं। वे जिस तरह मजमून से मजमून पैदा करते हैं और मानी की एक फजा बनाते हैं वैसे ही वे जबान से जबान नहीं बनाते। बल्कि प्रतीक संसार का सृजन करते हैं। जो मानी नहीं मानी की तरफ इशारा करता है।
तथाकथित समकालीन काव्य रसिक उन्हें खातिर में नहीं लाते थे तो काव्य के मर्मज्ञ और सह्वदय उनके प्रशंसक थे। यह बात स्वयं उनसे भी छिपी हुई नहीं थी। अपने शागिर्द नबी बख्श 'हकीर' को वे एक पत्र में लिखते हैं-
'मेरा कद्रदां (गुणग्राहक) कौन कि मैं उस पर नाज करूं।

बकौल डूम के
जो समझे वो हमारा गुलाम, जो न समझे हम उसके गुलाम।'
तत्कालीन दिल्ली ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान में उनके गुलामों की कमी नहीं थी। हां, उनकी अपेक्षा के बराबर संख्या नहीं थी और यह संभव भी नहीं था। कविता को मनोरंजन की चीज समझने वाले हर दौर में बहुसंख्यक होते हैं। गालिब के दौर में भी थे। फिर जो काव्य-परंपरा थी गालिब उसका पूरा का पूरा अनुकरण भी तो नहीं कर रहे थे। वे उसमें नए रास्ते भी तो तलाश कर रहे थे। अपने प्रिय शागिर्द मुंशी हरगोपाल 'तफ्ता' को लिखा-
यह न समझा करो कि अगले जो लिख गए हैं वह हक है।
क्या आगे आदमी अहमक पैदा नहीं होते थे
जब आप पूरी परंपरा को छोड रहे हों या उसमें नए रास्तों की तलाश कर रहे हों तो उस परंपरा का अनुसरण करने वालों से अपने हित की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं।
गालिब पहले शाइर हैं जो अपनी जात को केंद्र में रखते हैं। इसलिए जानने की प्रक्रिया में भी जात को तरजीह देते हैं। कहते हैं-
अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो

आगही गर नहीं गफलत ही सही
अर्थात् जो कुछ हो अपनी हस्ती (अस्तित्व) ही से हो। आप आगही (ज्ञान) नहीं तो गफलत (संज्ञाहीनता) ही सही। यानी ज्ञान हो या संज्ञाहीनता कुछ भी हो अपने अस्तित्व ही से हो। अन्यत्र कहते हैं-
हर चंद सबुकदस्त हुए बुतशिकनी में
हम हैं तो अभी राह में है संगे-गिरां और
सबुकदस्त (निव्त्त) एक संभावित अर्थ यह भी है कि यद्यपि मूर्तिभंजन से हम निवृत्त हो चुके हैं परंतु यदि हम या हमारा अस्तित्व शेष है, तो मार्ग में अभी संगेगिरां (भारी पत्थर, बाधाएं) बाकी हैं। अपनी प्रतिमा या अपना बुत भी तो जानने में सबसे बडी बाधा है।
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता

डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता
अपने होने (बीइंग- के मानो में भी और बीकमिंग के मानो में भी) का मरहला भी गालिब अपने अस्तित्व से बयान करते हैं। आश्चर्य, कौतुहल और जिज्ञासा उनके यहां इतनी है कि वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने जमाने में। उनका यह शेर बिलकुल सही है-
हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है
वो हर यक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता

यह 'यूं होता' किसी सुधारवादी या आइडियालॉजी का 'यूं होता' नहीं है बल्कि उस दानिशवर की मासूमियत है जिस के आगे दुनिया बच्चों का खेल है। जिसकी माशूक-फरेबी (सुंदरियों को लुभाना) का यह आलम है कि लैला उसके आगे मजनूं को बुरा कहती है।
मौलाना हाली ने तो हमें यह भी बताया कि मिर्जा गालिब इतने संवेदनशील और भावुक थे कि एक आदमी का विरोध भी सहन नहीं कर सकते थे। फिर जो चीज (शाइरी) उनके सम्मान का सामान और आत्म गौरव का कारण थी, उसी का साहित्य-समाज में अपमान हो रहा था। इस पर उनकी विनोद-प्रियता, हाजिरजवाबी और घुट्टी में पडी रईसी दोस्त कम और दुश्मन ज्यादा बनाती थी। कोढ में खाज की तरह जुआ खिलवाने में दो बार की गिरफ्तारी, एक बार तो जुर्माना भरके छूटे। लेकिन दूसरी बार कैदे-बामशक्कत की सजा हो गई। जुर्माना अदा करने पर मशक्कत तो मुआफ हो गई लेकिन कैद की सजा बरकरार रही। इस वाकिए ने सामाजिक प्रतिष्ठा को भी धक्का पहुंचाया। आर्थिक तंगी थी ही। इसका कारण माकूल आमदनी के अभाव के बावजूद शाह खर्च होना भी था। इस तरह की तमाम मुश्किलों का हल तो कुछ था नहीं, एक घुटन थी जिसकी निकासी शाइरी और पत्रों में होती थी। ऎसे अनेक शेर मौजूद हैं जिनसे उस समय की मन:स्थिति का आभास होता है।
गालिब के बारे में भी अनेक उल्टी-सीधी बातें मशहूर हैं। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही अतिवाद का शिकार रहे हैं। आज तो गालिब की प्रसिद्धि का यह हाल है कि सामान्य आदमी उन्हें उर्दू काव्य का पर्याय समझता है। जो शेर मशहूर हो जाए वह गालिब का। सामान्य जन की बात तो एक तरफ विद्वानों ने भी गालिब के शेरों को उनके जीवन की घटनाओं से जोड दिया है या यूं कहे कि शेर को सामने रख कर कहानी घड ली है।

गालिब के जीवन काल में उनके दीवान के पांच संस्करण छपे थे। पहले संस्करण में बहुत ही कम शेर थे। इसका कारण, उनके मित्रों का आग्रह या उनको यह डर कि उनकी दुरूह शैली को समझेगा कौन, रहा हो या कुछ और। परंतु यह बात तय है कि उन्होंने अपने पहले संस्करण पर खूब गौर किया होगा और संपादित करते समय बहुत से शेरों को मिर्ममता से काट दिया होगा। बाद के जमाने में जो गजलें उन्होंने कही, वे नए संस्करण में जुडती चली गई।
उनकी मृत्यु के बाद बहुत से लोगों ने गालिब के तमाम शेरों को जमा किया। इस श्ृंखला में अब तक का सबसे प्रामाणिक संस्करण जो तारीखी तर्तीब के साथ सामने आया है वह स्व. अलामा कालीदास गुप्ता 'रिजा' का 'नुस्ख-ए-गुप्ता-रिजा' है।

मिर्जा गालिब (पूरा नाम मुहम्मद असदउल्लाह बेग खां) 27 दिसंबर, 1797 को अकबराबाद (आगरा) में पैदा हुए। पिता का नाम अब्दुला बेग खां तथा मां का नाम इज्जतुनिस्सा बेगम था। स्व. मालिकराम के अनुसार गालिब का जन्म जोधपुर के राजा सूरजसिंह के पुत्र गजसिंह (प्रथम) की हवेली में हुआ। उनके पिता अलवर के राजा बख्तावर सिंह के यहां नौकर थे। 1802 में उनका देहांत हो गया। उन्हें राजगढ में दफन कर दिया गया। पांच वर्ष के गालिब और उनके छोटे भाई मिर्जा यूसुफ के चाचा नसरूल्लाह ने अपने साए में ले लिया। नसरू ल्लाह मराठोंं की तरफ से आगरे के किलेदार थे।

1803 में उन्होंने शहर आगरा लार्ड लेक के हवाले कर दिया। इसके एवज में उन्हें सत्रह सौ रूपए की तनख्वाह और अंग्रेजी फौज में चार सौ सवारों की रिसालदारी मिली। 1806 ईसवीं में हाथी से गिरने पर चाचा की भी मृत्यु हो गई। नवाब अहमदबख्श जो फिरोजपुर झरखा और लोहारू  के शासन थे, कि सिफारिश पर çब्ा्रटिश सरकार से नसरू ल्लाह बेग के वारिस होने के कारण गालिब और उनके परिवारजन को दस हजार सालाना का वजीफा मुकर्रर हुआ। जो एक ही माह में घटकर पांच हजार रूपए हो गया। इसमें मिर्जा गालिब का हिस्सा सात सौ रूपए सालाना था। तेरह बरस की उम्र में (18 अगस्त 1810) नवाब इलाहीबख्श खां 'मारू फ' देहलवी, जो नवाब अहमदबख्श खां के छोटे भाई थे, की ग्यारह साला बेटी उमराव बेगम से गालिब की शादी हो गई। गालिब के ससुर मारू फ स्वयं अच्छे शाइर थे और जौक से इस्लाह (काव्य में संशोधन) लेते थे। उनके दीवान छप चुके। उर्दू का यह मशहूर शेर इन्हीं मारू फ का है-
दर्दे-सर ही हो किसे संदल लगाने का दिमाग
उसका इक घिसना लगाना दर्दे-सर ये भी तो है
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