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सोमवार, 15 मार्च, 2010
प्रेम और वात्सल्य की कवयित्री
31 जनवरी 2010, 11:03 hrs IST
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साहित्य में नोबल पुरस्कार पाने वाली पहली लेटिन अमरीकी कवयित्री गेब्रिएला मिस्त्राल का शुरूआती जीवन बडी कठिनाइयों में गुजरा। तीन साल की उम्र में पिता की मृत्यु के बाद मां और बडी बहन के साथ संघर्ष करते हुए गेब्रिएला ने पंद्रह वर्ष की उम्र में इस नए नाम से कविताएं लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे स्थानीय अखबारों में कविताएं प्रकाशित होने लगीं। 7 अप्रेल, 1889 को चिली के विक्यूना गांव में जन्मी गेब्रिएला का मूल नाम लूसिला गोडोय था, लेकिन अपने दो प्रिय कवियों के नामों को मिलाकर अपना छद्मनाम रखा । जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही एक रेलकर्मी रोमिलियो यूरेता से प्रेम हुआ, लेकिन अज्ञात कारणों से प्रेमी ने आत्महत्या कर ली। इस हादसे से विचलित कवयित्री गहरे शोक में डूब गई और उसने मृत्यु के गीत लिखना शुरू कर दिया। बीस वर्ष की उम्र में इस दुर्घटना ने मिस्त्राल को उस काव्य परंपरा का सूत्रपात करने का अवसर दिया जो लेटिन अमरीकी साहित्य में पहले कभी नहीं हुआ यानी जीवन और मृत्यु को लेकर गहरी संवेदनाओं से ओतप्रोत कविताएं सामने आईं। पच्चीस वर्ष की उम्र में चिली की राष्ट्रीय काव्य प्रतियोगिता में गेब्रिएला की मृत्यु गीतों की पुस्तक को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

   छोटे बच्चों को पढाकर जीवनयापन करते हुए गेब्रिएला ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद निरंतर कविता लिखना जारी रखा। उनकी कविता और लेखन के केंद्र में चिली की लचर शिक्षा प्रणाली थी, जिसकी वजह से गरीब बच्चों, खासकर गांवों के बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित रहना पडता था। गेब्रिएला अखबारों में इस पर निरंतर लिखती थीं, इससे स्कूल प्रशासन नाराज रहता था। इसी नाराजगी के कारण पहले स्कूल ने उन्हें जबरन स्कूल से निकाल दिया। कई स्कूलों में अध्यापन करते हुए वे 1921 में चिली के सबसे प्रतिष्ठित सेंटियागो हाई स्कूल की प्रिंसिपल बनीं। इस बीच वे एक स्कूल में 16 साल के पाब्लो नेरूदा से मिलीं और नेरूदा को यूरोपियन कवियों को पढने की सलाह दी। प्रिंसिपल बनने के बाद उनका दूसरा कविता संग्रह आया तो वे अचानक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हो गईं। इस संग्रह में उन्होंने बच्चों और ईसाई धर्म को लेकर प्रार्थना की शैली में कविताएं प्रस्तुत की थीं। तीन वर्ष बाद तीसरे कविता संग्रह में पूरी तरह बच्चों को लेकर कविताएं लिखीं। प्रिंसिपल बनने के कुछ समय बाद गेब्रिएला को मेक्सिको में स्कूली शिक्षा और पुस्तकालय व्यवस्था में सुधार करने के लिए बुला लिया गया। मेक्सिको से वे अमरीका और यूरोप चली गईं। वहां वे मुख्य रूप से फ्रांस और इटली में रहीं, और अखबारों के लिए काफी लिखा। साथ ही साथ वे लीग आंॅफ नेशंस के बौद्धिक प्रकोष्ठ के लिए काम करती रहीं।

गेब्रिएला मिस्त्राल के लेखन में बच्चों के लिए गहरे प्रेम और वात्सल्य को अभिव्यक्ति मिली है। वे बच्चों को ईश्वर का प्रतिरूप मानती थीं। भारत में उनकी प्रसिद्ध कविता 'उसका नाम है आज' बहुत प्रसिद्ध है। यह कविता एस.ओ.एस. बालग्राम का आदर्श गीत बन गई है। गेब्रिएला ने कभी विवाह नहीं किया, लेकिन उनके भीतर मातृत्व की जो अद्भुत धारा अविरल प्रवाहित होती है, वह विश्व साहित्य में उन्हें नोबल पुरस्कार तक ले गई। 1945 में नोबल पुरस्कार प्रदान करते हुए नोबल कमेटी ने कहा कि अपने मातृत्व भरे हाथों से गेब्रिएला मिस्त्राल एक ऎसा पेय प्रस्तुत करती हैं, जो धरती का स्वाद देता है और मनुष्य के दिलों को तृप्त करता है। उनकी कविता का निर्झर कभी नहीं थमेगा और लोगों की प्यास बुझाता रहेगा। और निश्चय ही गेब्रिएला मिस्त्राल की काव्यधारा 1954 में उनकी मृत्यु के बाद भी विश्व साहित्य में अमर है। पाब्लो नेरूदा जैसे कवि को दिशा दिखाने वाली गेब्रिएला को आज भी दुनिया की तमाम भाषाओं में पूरी श्रद्धा के साथ पढा जाता है।

 पे्रमचंद गांधी
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