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आद्या
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31 जनवरी 2010, 11:01 hrs IST
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निर्गुण में सारे गुण रहते हैं; सगुण में सीमित गुण रहते हैं किन्तु सारे गुण नहीं। सारे गुण तो निर्गुण में ही रहते हैं। गुलाब कोठारी न साहित्यकार हैं, न कवि; न दार्शनिक न नेता। वे चतुष्कोटिविनिर्मुक्त हैं, माया की तरह। विश्वास न हो तो देख लीजिए, न उनका नाम साहित्य के इतिहास में मिलेगा, न कवियों के इतिहास में। वे न सम्पादक हैं, न मठाधीश। वे सभी उपाघियों से शून्य निरूपाघिक हैं, इसलिए वे सब उपाघियों से युक्त हैं।
जैसे निर्गुण में ही सारे गुण रहते हैं, वैसे ही निरूपाघिक में ही सारी उपाघियां रहती हैं। ऎसा ही निरूपाघिक गुलाब कोठारी को मैं देख रहा हूं। थोडा-बहुत जो कुछ परिचय उनके लेखन से और उनके व्यक्तित्व से मेरा पिछले एक वर्ष में हुआ है, उसी के आधार पर मैं यह कह रहा हूं। वे अपनी 'ऎन्द्री माया-शक्ति से पुरूरूप बनते हुए' भी किसी नाम-रूप से चिपकते नहीं हैं। इसलिए अनाम-अरूप ही बने रहते हैं और अनाम-अरूप ही बने रहेंगे। यही उन्हें अभीष्ट भी हैं क्योंकि वे मोक्ष को जीवन का चरम लक्ष्य मानते हैं; यदि वे अनाम-अरूप न हुए तो मुक्त कैसे होंगे पर वे नाम-रूप को मिथ्या नहीं मानते; नाना नामों और नाना रूपों में लीला करते रहते हैं। हां, है यह लीला ही——घडी में कुछ हैं पल में कुछ हैं।
एक बार मैंने उनसे पूछा कि कहा जाता है कि व्यक्ति को एक ही गुरू बनाना चाहिए, अनेक गुरू नहीं, तो आप इसे कहां तक उचित समझते हैं तो उन्होंने कहा कि जिस देश-काल में हम जिसके प्रति श्रद्धावनत होकर उससे कुछ ग्रहण कर रहे हैं, उस देश-काल में केवल वही हमारा गुरू है। मैं ऎसे 'डिप्लोमैटिक' उत्तर की आशा नहीं कर रहा था, किन्तु यह उत्तर मुझे तर्कसंगत अवश्य लगा। गुरू-तत्व तो एक ही है किन्तु हम उसे एक नाम-रूप में बांधे क्यों यदि 'गुरूर्ब्रह्मा, गुरूर्विष्णु: गुरूर्देवोमहेश्वर:' सत्य है और यदि 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' भी सत्य है तो फिर किसी भी नाम-रूप में, गुरू का दर्शन क्यों नहीं किया जा सकता और नाम-रूप तो 'अभ्व' है, अभी है, अभी नहीं है। यदि 'नाम-रूप' बदलेगा तो क्या गुरू भी बदल जाएगा संक्षेप में गुरू तत्व तो 'आभु' है, नित्य है और नाम-रूप 'अभ्व' है,अनित्य है। यह समझ लें तो गुरू-शिष्य सम्बन्ध ही नहीं, सारे सम्बन्ध-मात्र एक लीला बन जाते हैं। गुलाब कोठारी लीला-पुरूष्ा हैं और इसीलिए लीलापुरूषोत्तम श्रीकृष्ण उनके उपास्य हैं। एक ही साथ रास-लीला करने वाला और सुदर्शन चक्र चलाने वाला व्यक्तित्व श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मानव-जाति के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा हुआ हो।
श्रीकृष्ण के उपासकों में सर्वाघिक संख्या उनके बालरूप के उपासकों की रही है। महाकवि सूरदास ने उनके बालरूप को काव्य-जगत् में अमर कर दिया और अब आचार्य गुलाब कोठारी अपनी पौत्री आद्या को सम्बोघित करके लिखी गयी कविताओं में एक नए वात्सल्यरस की सृष्टि कर रहे हैं। और आद्या में कृष्ण को देख भी रहे हैं:-
आद्या/ पर्याय हो तुम/ कृष्ण का/ आनन्द का/ शुद्धता का (कविता 25) पौत्री का नाम आद्या है। और महाकवि कलिदास ने अपने सर्वोत्कृष्ट नाटक अभिज्ञान-शाकुन्तल में इसी आद्या को स्रष्टा की प्रथम सृष्टि बताकर उसे सर्वप्रथम नमन किया है-या सृष्टि: सृष्टुर् आद्या। अपने दूसरे काव्य में मेघदूत में भी उन्होंने नायिका को स्रष्टा की आद्या सृष्टि बनाया है-सृष्टिर् आद्यैव सृष्टु:। यदि क्रान्तदृष्टा कवि कोठारी को भी अपनी पौत्री आद्या में स्रष्टा की आदि सृष्टि दिख पडी हो तो आpर्य की बात नहीं। आद्या/ आकाश हो तुम,/ कोई न था/ तुमसे पहले/ इस जगत में, (कविता, 46) किन्तु कवि कालिदास की आद्या जहां प्रौढ नायिका है, कवि कोठारी की आद्या एक नन्हीं बालिका है जिसकी लघुता-हल्कापन-ही कवि के लिए गुरू बन गया है क्योंकि कवि को उसमें एक जीवन्मुक्त का दर्शन हुआ है। जब तुम हुई थी पैदा/ आद्या,/ तब थी पूर्ण/ साक्षी भाव में/ न क्रिया थी/ न ही प्रतिक्रिया (कविता, 95) लघु को अंग्रेजी में 'लाइट' कहेंगे और इस 'लाइट' से ही आनन्द का वाचक अंग्रेजी शब्द 'डिलाइट' बना है। कवि के लिए उसकी पौत्री जीवन्मुक्त है, 'लाइट' है हल्की-फुल्की है, 'डिलाइट' है, आनन्दस्वरूपिणी और 'लाइट' भी है, प्रकाश रूपिणी भी है। उसके इस हल्के-फुल्के, जीवन्मुक्त आनन्दस्वरूप तथा प्रकाशमय रूप में कवि को एक अप्रतिम गुरूत्वाकर्षण मिला कि कवि गुलाब 'बन्द है कली/ कौन जाने/ क्या है अन्दर/ उसके,/ यही जिज्ञासा'(कविता, 1) लिए कली के अन्दर छिपे अपने 'गुलाब' को ही ढूंढ लेता है।- 'मैं भीतर हूं/ तुम्हारे, और तुम/ मेरे भीतर' (कविता, 55)
इसे ही साहित्यशास्त्री साधारणीकरण कहते हैं, जहां कवि का अपने प्रतिपाद्य से तादात्म्य सम्बन्ध इस प्रकार स्थापित हो जाए कि वे दो रह कर भी दो न रहें। 'गुलाब' आद्या कली में अपने को और अपने में आद्या कली को देख पाए हैं तो उपनिषद् का यह महावाक्य चरितार्थ हो गया है कि जो 'सबको अपने में और अपने में सबको देखता है, वह अभय हो जाता है और जिसके लिए सब प्राणी अपनी आत्मा ही बन गए उस एकत्वदर्शी के लिए फिर मोह और शोक कहां यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मैवानुपश्यति। सर्वभूतेषुचात्मानं ततो न विजुगुप्सते।। यस्य सर्वाणिभूतान्यात्मैवाभद्विजानत:। तत्र को मोह: क: शोक: एकत्व मनुपश्यत:।।
'गुलाब' और कली अलग-अलग रह पाए हैं, अत: आनन्द बरस पाया है, एकाकी तो ब्रह्म का मन भी नहीं रम पाया था-स एकाकी नरेमे 'जड हो जाता है/ अकेला मनुष्य/ पाषाणवत्' (कविता, 90) किन्तु क्योंकि कली में 'गुलाब' छिपा है, इसलिए ये दोनों द्वैत के भय से मुक्त हैं। यही काव्यानन्द की वह स्थिति है जिसे 'ब्रह्मानन्दसहोदर' कहा गया है। आनन्द की चर्चा चली तो रससिद्धान्त हमारे सम्मुख आ जाता है। रसात्मक वाक्य ही काव्य है-वाक्य रसात्मकं काव्यम् । कवि कोठारी ने अपनी इस कवितावली में दो रसों का परिपाक किया है—वात्सल्यरस और अद्भुत रस। स्थूल दृष्टि से यहां वात्सल्य रस ही दृष्टिगोचर होगा किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से यहां अद्भुत रस ही अङग्ी है, वात्सल्य तो उसका अङग् है। अद्भुत रस का स्थायी भाव विस्मय है। विस्मय का अर्थ है-जहंा 'स्मय' अर्थात् अहङक्ार न हो। अहङक्ारी को कहीं भी विस्मय नहीं होता; वह मानता है कि वह सब कुछ जानता है। निरहङक्ारी को पदे पदे विस्मय होता है। साधना ने कवि कोठारी का अहङक्ार विगलित कर दिया है अत: उसे आद्या की प्रत्येक गति विस्मित करती है। यही विस्मय इन कविताओं में अद्भुत रस की सृष्टि करता है।-
'आद्या!/ तुम्हारा संसार/ कर्म और ज्ञान का/ अद्भुत है/ नहीं पा सकता/ पार/ मेरे जैसा अल्पज्ञानी' (कविता,20) सृष्टि का प्रत्येक रहस्य आद्या में प्रतिबिम्बित हो उठा है। जैसे पिण्ड में ब्रह्माण्ड प्रतिबिम्बित होता है। क्योंकि वेद विज्ञान सृष्टि-विज्ञान है, अत: आद्या कवि के लिए वेद विज्ञान की जीवन्त प्रयोगशाला बन गयी है। उसमें कवि कर्म (कविता, 36) अगिA-सोम, विद्या-अविद्या, ब्रह्म-माया (कविता, 38) तीन सवन (कविता, 43), मन्त्र (कविता, 70) प्रकाश-विमर्श (कविता, 87) अहंविमर्श (कविता, 97) संकुचन-प्रसरण, स्पन्दन (कविता, 143), तन्मात्रा (कविता, 144) शुद्ध मायाभाव (कविता, 156), गति (कविता, 194), भेद, अभेद, ईश्वर (कविता, 198) जैसे अनेकानेक वेद विज्ञान के शास्त्रीय शब्दों का सहज ही प्रयोग कर जाता है। आद्या में उसे पूरी सृष्टि-विद्या उतरती दिखायी देती है। और क्योंकि सृष्टि-विद्या स्वयं एक रहस्य है अत: पूरी कवितावली में अद्भुत रस भरा है।
'जैसे ही आई/ वो/ मेरी गोद में,/ लगा जैसे/ हो गया हूं/ आवृत्त पूरा/ उसके आभामण्डल से' (कविता, 2) और रहस्य तो अध्यात्म है। एक रहस्य देखें- 'जीवन्त हो गए/ सारे देव/ इस कक्ष के/ अचानक/ देखकर/ यह चित्र/ आद्या का' (कविता, 3) अभिप्राय यह कि शायद ही कोई कविता हो जिसमें विस्मय का भाव न हो। यदि सारे उद्धरण दें, तो पूरी कविताएं ही उद्धृत करनी पड जाएंगी। अध्यात्म को कविता में पहले भी अनेक कवियों ने ढाला है। किन्तु यह तथ्य शायद पहली बार इन कविताओं में ही उजागर हुआ है कि अध्यात्म की आत्मा वैराग्य नहीं; विस्मय है। ऎसा इसलिए हुआ कि कवि कोठारी मध्ययुग के उस नकारात्मक अध्यात्म की छाया में नहीं लिख रहे जिसमें जीवन का निषेध है अपितु वैदिक युग के उस अध्यात्म के आलोक में जी रहे हैं जहां जीवन से बढकर और कुछ भी नहीं। क्योंकि जीवन में ही तो सत्य का दर्शन सम्भव है- इह चे दवेदीरथ सत्यमस्ति/ नो चेदवेदीन्मिथ्या विनष्टि:।
इन कविताओं में श्मशान की शान्ति लक्ष्य नहीं है, जीवन के बीच की स्थितप्रज्ञता लक्ष्य है। 'न कोई स्मृति/ न कोई कल्पना/ जीती हो तुम/ सदा वर्तमान में/ निर्विकार रह कर' (कविता, 28) स्थित प्रज्ञता में भी स्थिति मुख्य नहीं, प्रज्ञा मुख्य है। इसलिए ये कविताएं काश्मीर शैव दर्शन की केसर की क्यारी से स्पन्दित हैं और 'रसौ वै स:' के उद्घोष से गुç†जत हैं। यह वैदिक अध्यात्म है, जिसमें नि:श्रेयस अभ्युदय का साधक हैं, बाधक नहीं। इसी अध्यात्म को गुलाब कोठारी स्वयं भी जी रहे हैं।
वेद में कहा कि जो çस्त्रयां हैं वे भी पुुरूष ही हैं। स्त्री-पुरूष समानता के युग में यह प्रागैतिवैहासिक काल का वैदिक मन्त्र विशेष रूप से विचारणीय है-çस्त्रयस्सतीस्ता उ पुंस आहु:। और कोठारी जी ने, इसलिए, इस मन्त्र का रूपान्तरण कर दिया है- 'आद्या,/ नारी नहीं हो/ पुरूष हो/ तुम भी/ हमारे जैसी' (कविता, 8)
सृष्टि की उत्पत्ति पुरूष का जागरण है, और उसका सो जाना प्रलय है। यही ब्रह्मा के दिन और रात हैं। यही प्रकृति का विष्ाम अवस्था में और साम्य अवस्था में चले जाना है। इस अत्यन्त गूढ रहस्य को कवि ने एक छोटी सी बालिका के सोने और जागने में कितनी सहजता से देख लिया- 'आद्या के सोते ही/ हो जाती है/ प्रलय/ जगत् में,/ थम जाती हैं/ गतिविघियां/ सृष्टि की/ करने लगते हैं/ ब्रह्म भी/ प्रतीक्षा/ जागरण की,/ कैसे करें/ सृष्टि वह भी/ बिना माया के', (कविता, 12)
कवि केवल सैद्धान्तिक चर्चा करके ही नहीं रह जाता, उसे यह भी चिन्ता है कि दर्शन का जीवन में उपयोग हो। डिब्बे के दूध मेे कैलोरी है किन्तु क्या कैलोरी से ही विज्ञानभाव और आनन्द का विकास हो जाएगा (कविता, 18) कहीं-कहीं कवि के पदों में उपनिषद् और आचारीग दोनों एक साथ उतर आए हैं:- 'न शब्द/ न ध्वनि/ न स्पन्दन/ न वैखरी/ न कोई अर्थ/ बस भाव हैं **** बिना परिग्रह के/ आत्मस्थ है बस' (कविता, 19) ध्वनि काव्य की आत्मा है-ध्वनिरात्मा काव्यस्य। आद्या की बाललीला के वर्णन में कवि ने ध्वनि का अद्भुत प्रयोग किया है- 'और कभी-कभी/ कर देती हो/ 'हर हर गंगे/ गोदावरी' (कविता, 22) कवि कुलगुरू कालिदास ने लिखा था कि जो सन्तान के अंगों की धूल से मैले हो जाते हैं, वे धन्य हैं—धन्यास्तदङग्रजसा मलिनी भवन्ति। और कवि गुलाब ने 'हर हर गंगे गोदावरी' में स्त्रान करके धन्यता अनुभव की। व्यष्टि से कवि समष्टि पर आकर इतना संवेदनशील हो जाता है कि पाठक को अन्दर तक हिला देता है। अद्य जो आद्या है, कृष्णा है, कल उसे उस दुनिया में रहना पड सकता है जहां रिश्ते-नाते हो ही नहीं-
'कृष्णे!/ महाभारत होंगे/ किन्तु लोग/ अदृश्य होंगेे/ रिश्ते तो/ रहेंगे ही नहीं' (कविता, 32) कालिदास ने कहा था कि रम्य दृश्य देखकर और मधुर शब्द सुनकर जब व्यक्ति उत्सुक हो जाता है तो पूर्वजन्म के किसी मैत्री भाव को स्मरण करता है- रम्याणि वी™य मधुरांp निशम्य शब्दान् पर्यत्सुकीभवति यत्सुखितोजोपि जन्तु: तच्चेतसा स्मरतिनूनमबोधपूर्वम् भावस्थिराणि जननान्तर सौह्वदानि।। और आद्या भी खिलौने को देखकर अपने किन्ही पुराने जन्मों को ही याद करती है- 'तुम्हारे खिलौने/ कुत्ते, घोडे,/ खरगोश, हाथी/ ये भी दिलाएंगे/ याद तुमको/ किसी जन्म की' (कविता, 36)
वस्तुत: 'मानस' का लेखक मन की गहराइयों में इतना अघिक उतर जाता है कि वीतरागता का स्पर्श कर लेता है मन के पार जा कर- 'घृणा अलग नहीं/ प्रेम से/ क्रोध उसी पर/ उतरता है,/ जहां प्रेम है' (कविता, 38) इतनी वीतरागता की भूमि में तपस्या का मंगलकारी रूप दिखायी दे जाता है—बलिहारी दु:ख आपने पलपल नाम रटाये- 'तपना ही है/ प्रकाश जीवन का,/ समर्पण है इसमें,/ सुख नहीं तपाता/ किसी को भी/ मत भागना पीछे/ सुखों के/ भूलकर भी/ कर देगा दूर/ जीवन से/ खो जाओगी तुम' (कविता, 40)
इस वीतराग में से ही, प्रादुर्भूत होता है अनुराग-वैराग्यादेवानुराग:। आद्या को देख कवि को अपना बचपन याद आता है, वह भारत जिसे महात्मा गांधी ने असली भारत माना था-
'मिट्टी के घर/ गोबर के हाथ/ गायों का बंाटा/ गिल्ली-डंडा/ और कंचे' (कविता, 55) कवि जिस जीवन दर्शन का प्रतिपादन करना चाहता है, नितान्त शुद्ध, बुद्ध, मुक्त जीवन सन्त का, और उसमें उसे शूल-सी चुभती है संतों की लोकैषणा। गुरूओं की स्थिति हो गयी है कि
'वे भी जीने लगें/ अपेक्षाओं में/ करने लगे हैं/ पीएच.डी/ संसार छोडकर।' (कविता, 69) कवि नयी उपमाएं चुनता है तो अलंकार शास्त्र सोच में पड जाता है- 'तुम्हारा चेहरा/ निशब्द-सा/ टकटकी बांधे/ देखता रहता है/ चारों और/ राडार की तरह' (कविता, 71) भारतीय दर्शन में ईश्वर के अनेक रूप हैं-कत्तुüमकत्तुüमन्यथा कत्तुüम् समर्थ' एक रूप हैं, क्लेश कर्म विपाकाशय से अपरामृष्टं' दूसरा रूप हैं, 'स्रष्टा' तीसरा रूप हैं। ईश्वर पर बौद्ध-जैनों के अतिरिक्त सांख्य के आक्षेप हैं। इस सबका समाधान पढें- 'क्या करोगी/ मांगकर ईश्वर से,/ देता है वह तो/ देखकर पात्रता।/ ऎसा करना कुछ/ वह भी आए/ तुम्हारे द्वार/ मांगने तुमसे/ जैसे आए थे/ बलि के द्वार' (कविता, 88)
वियोग श्ृंगार की तरह अब वियोग-वात्सल्य का रूप देखें- 'ढंूढता रहा/ तुमको चहुंओर/ देख लेता बस/ तस्वीरें तुम्हारी/ और छलक जाते/ आंखों से आंसू/ रूंध जाता गला/ बात करते करते/ टूट गयी माला/ छूट गए मन्त्र' (कविता, 108) स्वाभावोक्ति अलंकार में चमत्कार मिलना बहुत दुर्लभ है। कवि ने आद्या के स्वत:स्फूर्त तालियां बजाने की क्रिया की अद्भुत व्याख्या की है- 'तुम ढूंढती हो/ उस अदृश्य को/ खडी होकर/ किसी सहारे से/ जो दिखता नहीं/ तुमको बैठे-बैठे/ किसी की गोद से/ और बजाती हो/ तालियां स्वयं ही/ जब कुछ नहीं/ देता दिखाई/ खडे होकर भी' (कविता, 164)
यहां स्वाभावोक्ति अलंकार के प्रयोक्ताकवि और 'यच् चक्षुष्ाा न पश्यति' (जिसे आंखों से नहीं देखता है कोई) वाले औपनिषद दार्शनिक का ऎसा गंगा-यमुना-संगम हुआ है कि कवि सचमुच क्रान्त द्रष्टा ऋषि हो गया है-कविर्मनीष्ाी परिभू:स्वयम्भू:। वस्तुत: यह कवितावली अकेली ही एक पूरे शोध प्रबन्ध का विषय बन सकती है, कामायनी की तरह। मेरे इस स्वत:स्फूर्त लेख में अघिक विश्लेषण लेख की सहज सुन्दरता को कम ही करेगा। पर कवि की लोकव्यवहार पर सूक्ष्म पकड का एक उदाहरण अवश्य दर्शनीय है-
'घर वाले कहते हैं/ लक्ष्मी आई है/ क्यों कहते हैं/ पता नहीं/ शायद देते हैं/ सान्त्वना हमको/ कन्या जन्म पर/ लक्ष्मी शब्द भी/ बोला नहीं जाता/ प्रसन्नता से,/ बोलते हैं/ दबी जुबान से' (कविता, 185) और यह कहकर कवि ने खुली जुबान से घोçष्ात कर दिया- 'मुझे लगा है/ सरस्वती हो *** दौडी आ रही है/ लक्ष्मी तो/ पीछे पीछे/ तुम्हारे' (कविता, 185) आजकल विज्ञान और अध्यात्म में समन्वय बिठाने का फैशन चल निकला है, पर कवि कुछ और ही कह रहा है- 'तुम आई हो/ आद्या/ विज्ञान युग में/ जो चलाता है/ जीवन को/ बिना दिल के' (कविता, 111) सारी कवितावली में 'बिना दिल के जीवन' का बहुत मर्मस्पर्शी वर्णन है। बोतल के दूध पर ढेर सारे व्यंग्य हैं। किसी कवि ने कहा था- अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी/ आंचल में है दूध और आंखों में पानी 'बिना दिल के जीवन' ने न आंचल में दूध रहने दिया न आंखों में पानी। सारी चिकित्सा मनुष्य को शरीर मान रही है। प्राण, मन, विज्ञान, और आनन्द का पता नहीं है। और अन्त में वेदान्त का ज्ञान और सूफियों का प्रेम एक सूत्र में पिरो दिये जाते हैं- 'यह भेद ही/ संसार है आद्या/ अभेद ईश्वर है *** ढूंढ लेना है/ इस अभेद को/ प्रेम मार्ग से' (कविता, 198) इतना तो कवि बोला। पर यदि इतने से आपको सन्तोष न हुआ हो तो उसे सुनिए ये जो आद्या स्वयं बोली। इसे सुन कर आपको अवश्य सन्तोष हो जाएगा- 'आदु-आदु/ पालू-पालू/ बेतू-बेतू/ पालू-पालू/ आदु-आदु/ गा ओ/ आदु-आदु/ ना चो,/ आदु-आदु/ आ ओ' (कविता, 68) जीवन्त कविता का इससे ज्यादा अच्छा उदाहरण किसी ने देखा है क्या योस्याध्यक्ष:/ परमेव्योमन्/ सोअंगवेद/ यदिवानवेद जिसने सृष्टि के रहस्य को जानना चाहा वह आदु-आदु पालू-पालू कह कर तुतलाने लगा, स्पष्टाक्षरों में कौन कह पाया है।
पुस्तक आद्या लेखक गुलाब कोठारी प्रकाशक पत्रिका प्रकाशन, 409, लक्ष्मी कॉम्पलेक्स, एमआई रोड, जयपुर-302004 मूल्य 395 रूपए पृष्ठ 510
प्रो. दयानंद भार्गव
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