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शुक्रवार, 12 मार्च, 2010
वो डायरी!
18 नवम्बर 2009, 10:39 hrs IST
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लैटर में कुछ यूं लिखा था,
'प्रिय सोमेन!
तुम्हें शायद याद हो, हम महाराजा कॉलेज होस्टल में साथ-साथ रहा करते थे। तुम ग्राउंड फ्लोर के रू म नं. 33 में रहते थे और मैं तुम्हारे कमरे से एक कमरा छोडकर रू म नं. 35 में। तुम बांसुरी कितनी अच्छी बजाते थे। और मैं टेबल पर तबला बजाकर तुम्हारी संगत करता था। याद आया, कॉलेज वीक सेलिब्ा्रेशन मनाने की पूरी रू परेखा तुमने, मैंने और दिल्ली के अडवानी ने मिलकर बनाई थी। पूरे सप्ताह के इस रंगारंग कार्यक्रम में सामने महारानी कॉलेज की लडकियों को भी हमने पार्टीसिपेट करने के लिए राजी कर लिया था। उन दिनों ये बहुत बडी सफलता थी। संगीत, कॉमेडी और ड्रामे से भरपूर इस कार्यक्रम के लिए तुम्हें याद होगा, प्रिंसिपल कपूर और हॉस्टल के वार्डन सक्सेना साहब खुद चलकर तुम्हारे कमरे पर आए थे, बधाई देने।
तुम आश्चर्य कर रहे होंगे कि तीस-पैंतीस साल के अरसे के बाद मुझे तुम्हारी अचानक याद कैसे आ गई पहली बात तो ये कि मेरे पास तुम्हारा एड्रेस नहीं था सिर्फ यादें थीं बीते वक्त की। फिर मेरा उधर आना नहीं हुआ। आता भी तो किससे पता पूछता तुम्हारा वो तो एक दिन अखबार में तुम्हारी रहस्यमयी कहानी नजर आ गई। मुझे ये भी तय नहीं था कि वो लेखक तुम्हीं हो। ये तो मुझे मालूम था कि तुम्हें भूत-प्रेत के अस्तित्व और अन्य रहस्यमयी बातों में बहुत इंट्रेस्ट था, लेकिन यार! तुम लेखक कब से बन गए अखबार के संपादक से तुम्हारा एड्रेस मिला, इसके साथ ही संयोगवश ट्रेन में दुबे से मुलाकात हो गई। याद है वो बंदा, जो सुबह पहले हॉस्टल के ग्राउंड में लगी पैरेलल बार पर कसरत किया करता था और माउथ ऑर्गन पर अच्छी धुनें बजाता था। उसकी बजाई हुई धुनें अभी भी कानों में गूंजती हैैं। उसने भी तुम्हारे बारे में जानकारी दी थी।
अब मैं तुम्हारी वो चीज तुम्हें लौटाना चाह रहा हूं, जो मैंने तुमसे बिना मांगे चुरा ली थी। सोचो! खूब सोचो! याद नहीं आया तुम्हारे यहां आने पर वो चीज देकर तुम्हें सरप्राइज दूंगा। दिल पर एक बोझ है कि वो चीज मैं तुम्हें लौटाऊं और तुमसे माफी मांगूं। तुम्हें मेरा पता ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं आएगी, किसी से भी पूछ लेना कि ठाकुर कुलदीप सिंह का महल कहां है
मैं रेलवे स्टेशन पर तुम्हें रिसीव करने के लिए किसी को भेज दूंगा। मैं आता, पर मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि तुम से मिलूं और तुम्हें तुम्हारी चीज लौटाकर अपने दिल का बोझ हल्का करू ं। तुम जरू र-जरू र आना!
आखिर में लिखा था, 'अपनी यादों के उजाले मेरे पास रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।'
तुम्हारे इंतजार में,
कुलदीप सोलंकी।
पहले तो मैंने लाख कोशिश की याद करने की कि आखिर मेरी वो क्या चीज थी, जिसे कुलदीप इतने सालों के बाद लौटाना चाह रहा था फिर आखिर में लिखे हुए इस शेर ने मुझे भावुक बना दिया, 'न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए'

मैंने उसी दिन ट्रेन पकडी और रात को करीब 9 बजे अजबगढ के रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया। छोटा-सा रेलवे स्टेशन था। इक्का-दुक्का सवारियां ट्रेन से उतरीं और पैदल ही चलकर न जाने कहां गुम हो गईं। प्लेटफार्म से बाहर निकलकर मैंने तलाश किया कि क्या कोई मुझे लेने आया है, जैसा कि कुलदीप ने वादा किया था। बाहर घुप्प अंधेरा हो चला था। घने कोहरे में लिपटे हुए दरख्त किन्हीं प्रेतात्माओं की तरह खामोश खडे दिख रहे थे। घने जंगल में गुम होता एक पगडंडीनुमा रास्ता नजर आ रहा था। इतने में एक बहुत पुराने मॉडल की खुली जीप प्रकट हुई, जिसमें से सफेद कपडे पहने व्यक्ति ने उतरकर पूछा 'क्या आप सोमेन बाबू हैं जयपुर से आए हैं' मैंने कहा, 'हां!' वो बोला, 'ठाकुर साहब आपका बडे बेसब्ा्री से इंतजार कर रहे हैं।' कच्चे रास्ते में हिचकोले खाते जीप की तेज हैडलाइट्स की रोशनी से अंधेरे को चीरते हुए हम बहुत देर तक चलते रहे। फिर अचानक एक पहाडी मोड के चक्कर लगाकर गाडी एक छोटी-सी पहाडी पर बने किलेनुमा महल के अंदर दाखिल हो गई।

महल के दरवाजे पर ही कुलदीप मिल गए। उम्र के हिसाब से चेहरे की रेखाएं गहरा गई थीं। शरीर भी थोडा भारी हो गया था। पर आंखों में वो ही चमक थी, वो ही मस्ती। बोला, 'यार! मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम आओगे। तुम समझ नहीं सकते कि तुम्हें यहां पाकर मुझे कितनी खुशी हो रही है। आओ! इस महल में तुम्हारा स्वागत है, चलो अंदर बैठेंगे। तुम आज बहुत मुबारक मौके पर आए यार! आज मेरा जन्मदिन है और सारी रात जश्न मनाए जाएंगे। तुम्हारे जैसे जिगरी के बिना जश्न कैसा तुम्हारी पसंद मुझे मालूम है, तुम्हारे लिए मैंने बंगाली मिठाइयां मंगाकर रखी हैं। केसरबाटी, रसगुल्ले, राजभोग और भी बहुत सारी बेहतरीन मिठाइयां। हलवाइयों से तुम्हारी पसंद की चीजें बनवाई हैं। और यार! ये बताओ कि तुमने कुछ खाना-पीना भी शुरू  किया कि नहीं या वो ही घासफूस खाने वाले शाकाहारी बने हुए हो ड्रिंक्स वगैरह लेना शुरू  किया कि नहीं कि अभी भी वो ही नींबू की शिकंजी ही लेते हो' मैंने कहा, 'मेरी खान-पान की आदतें वो ही हैं। तुम राजघराने से ताल्लुक रखते हो, तुम्हारे यहां ये सब कुछ चलता है। मुझे ऎसा करने की कोई जरू रत भी महसूस नहीं होती।'
'चलो छोडो यार! बातें करते हैं।' हम लोग बीते हुए जमाने की मीठी-मीठी यादों में खो गए। वो बातें, वो यादें अभी तक भी जेहन में इस तरह ताजा थीं जैसे आज की ही बातें हों। चलो पहले तुम्हें अपने गरीबखाने की सैर करवाऊं। वो आगे-आगे चलकर मुझे महल दिखाने लगे। बहुत बडा और बहुत इलाके में फैला हुआ कई मंजिला महल था वो।

अब हम एक बडे लंबे-चौडे हॉल में दाखिल हुए। यह दरबारे खास था। एक से बढकर एक खूबसूरत झाडफानूस छत से लटके हुए थे जिनमें जलती मोमबत्तियों से बिखरती रंग-बिरंगी रोशनियों के दायरे कलरफुल पैटर्न बना रहे थे। सारंगी, सितार, बांसुरी, तबले और ढोलक की थापों पर नृत्यांगनाओं के पैर बिजली की सी चपलता से उठ रहे थे। बाहर विशाल लॉन में बने शानदार पंडाल में खाने का दौर चल रहा था।  शहनाइयों ने माहौल को उत्सवमय बना रखा था। लगता था हम किसी परीलोक में आ गए हैं। गुलाब के फूलों की ढेर सारी मालाओं से निकलती खुशबू वातावरण को मादक बना रही थी। वहां के महलों की शानो-शौकत को मैंने अपने मूवी कैमरे में कैद कर लिया कि इन यादगार लम्हों को कभी दोहरा लेंगे देखकर।

रात को दो तीन बजे तक खाने-पीने और नृत्य संगीत का प्रोग्राम चला। अब थकान होने लगी थी। मैंने कहा, 'कुलदीप! यार अब मुझे नींद आ रही है। सोने का इंतजाम कहां किया है' उसने अपने दरबान को बुलाया और कहा, 'साहब के सोने का बंदोबस्त मेहमानखाने में कर दो।' इससे पहले कुलदीप ने मुझसे कहा, 'एक मिनट ठहरो यार!, तुम्हारी वो चीज तो मैं तुम्हें लौटा दूं, जो मेरे मन पर इतने दिनों से बोझ बनी हुई है। सोमेन! तुम्हें याद होगा तुम हंसी मजाक की शेरो-शायरी और कविताएं सुनाया करते थे। और इतने मजेदार चुटकुले कि लोगों के पेट में हंसते-हंसते बल पड जाते थे। ये सब तुम अपनी एक डायरी में से सुनाया करते थे। एक दिन मौका पाकर मैंने तुम्हारी वो डायरी उडा ली थी। तुम्हें बहुत परेशानी भी हुई थी, उसके खोने से। बहुत तलाश किया था तुमने उसे, मुझसे भी पूछा था कि क्या मैंने उस डायरी को देखा था लेकिन उस वक्त मैं एकदम साफ झूठ बोल गया था। बाद में मुझे मेरी आत्मा धिक्कारती रही कि तुमने अपने एक दोस्त के साथ बहुत बुरा किया। उसके लिए मैं अपने आपको कभी भी माफ नहीं कर पाया। उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। बोला, 'हो सके तो मुझे माफ कर देना।' 'ये कहकर उसने मेरी वो डायरी लौटा दी।' बस इतनी सी बात के लिए दुखी हो रहे थे क्या' मैंने कहा। 'तुम्हारे लिए छोटी बात होगी सोमेन! लेकिन मेरे लिए ये बहुत बडे संतोष की बात है कि मैंने तुम्हारी वो चीज तुम्हें लौटा दी, वरना मुझे मरने के बाद भी चैन नहीं मिलता।'

रात बहुत हो चली थी, सफर में नींद थोडे ही आती है और फिर रात भी आधी से ज्यादा बीत चुकी थी। थकान के मारे मुझे नींद के झोंके आने लगे थे। मैंने कहा, 'यार कुलदीप! अब मुझे सोने दो यार सारा बदन टूट रहा है, फिर मुझे सुबह वाली ट्रेन भी पकडनी है।' उस शानदार महल के शाही बेडरू म के मखमली गद्दों पर लेटते ही कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला। जब नींद खुली तो देखा सूरज चढ आया था, धूप निकल आई थी। उस महल और कुलदीप का कहीं अता-पता नहीं था। केवल महल के खंडहरों की ढहती दीवारें, छतों से लटकते चमगादड, मकडियों के जाले थे वहां। जहां मखमल के गद्दों पर सोया था, वहां चार-चार इंच मोटी धूल की तह बिछी हुई थी। जगह-जगह जंगली घास-फूस उग आई थी। वो झाडफानूसों से निकलती रंग-बिरंगी रोशनियों के नाचते दायरे, वो साजिंदे, वो परियों से भी ज्यादा खूबसूरत नृत्यांगनाएं, सब न जाने कहां गायब हो गए थे। लगा जैसे सब कुछ हवा में पिघल गए हों।

तो क्या ये सब सपना था लेकिन! वो डायरी तो मेरी बगल में पडी थी, जिसे कुलदीप ने मुझे पिछली रात ही लौटाया था। डायरियां तो सपनों में नहीं आतीं फिर उजाड और खंडहर हुए महलों के अवशेषों में वो ऎसी हालत में कैसे रह सकती थीं हवा, पानी और दीमक ने उसे कभी का बरबाद कर दिया होता। वो तो ऎसी हालत में थी जैसे उसे बहुत सार-संभाल कर और किसी की अमानत समझ कर सहेजकर रखा गया हो। मेरी जिंदगी के लिए ये सबसे अजीबोगरीब और रहस्यमय अनुभव था। समझ से परे था। ऎसा कैसे संभव है किले के परकोटे के बाहर चाय की थडी पर कुछ ग्रामीण लोग बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। मैंने जब उनसे ठाकुर कुलदीप सिंह के बारे में पूछा तो वे बोले, 'साहब, उन्हें तो गुजरे ही अरसा बीत गया!' लेकिन मेरे मूवी कैमरे में अभी भी सफेद से पारदर्शी कोहरे में लिपटी चलती- फिरती धुंधली तस्वीरें इस बात की गवाह हैं कि ये सब सपना तो नहीं था! क्या किसी और डायमेंशन में ये सारी चीजें अभी भी मौजूद हैं क्या सोमेन केवल वो डायरी ही लौटाने आया था

 डॉ. देवेंद्र जैन
Comments
I read and realise it. I would like to thank you for your excellent collection. Thank You very much, Krishan R. Suthar ...
20 दिसम्बर 2009, 09:49 hrs IST , by Krishan Suthar from Mumbai, MH
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